शुभंकर गिरि

Tuesday, August 3, 2010

हमने मरासिम का सिलसिला देखा

हमने तेरी महफ़िल में तन्हाई का आलम देखा
यार दोस्त रिश्ते नातों में दुनियादारी का दर्पण देखा.

मीत अजाना दर्द सुहाना बरसों का एक कर्ज़ पुराना
तेरी सूरत में हमने ये मत पूछो क्या क्या देखा

तेरी मर्ज़ी मेरी तस्वीर को तू जिस नज़र से देख
तेरी तस्वीर को हमने बतौर-ए-बुतपरस्त देखा

न हम वाकिफ़ ही थे तुमसे न तुम हमसे ही वाकिफ़ थे
हमारा हौसला था हमने मरासिम का सिलसिला देखा

अल्हड फ़क्कड और फ़रेबी सीधा मानो एक जलेबी
जिसने भी हमको देखा बस तन की आंखों से देखा

न जाने इस जहाँ में उसका ठिकाना कहाँ होगा
आसमां को जिसने जमीं की निगाह से देखा

वो और होंगे जिन्होंने बच्चों को खेलते देख
इन मासूम परिंदों में हमने अपना बचपन देखा

आकर्षण कुमार गिरि

No comments:

Post a Comment

वो जो इक तीर सा तेरी नजर से निकला था।।

छोड़के मुझको मेरे दर से जब तू निकला था। जैसे आकाश फटे, खूं जिगर से निकला था।। किसी की न सुनी, सब की जान ले के गया। वो जो इक तीर सा...