शुभंकर गिरि

Friday, July 30, 2010

उस ठूंठ से परिंदों ने घोंसले हटा लिये...

तुम्हारे ख्वाब की ऐसी हसीं ताबीर थी जानम
तेरे दामन पे हम पैबंद दिखते सो मुकर लिये.

गली थी बंद उसका आखिरी मकान तेरा था
न अब कोई बहाना था सो हम वापस को हो लिये.

न तुम मेरे रहे और न तन्हायी मेरी हुई
भला मैं क्यों भटकता महफ़िल-ए-तिश्नगी के लिये.

दश्तो-सहरा, दरिया-साहिल सबका एक फ़साना है
और भला हम क्या गा लेते अपना टूटा साज़ लिए.

जिस साये में 'गिरि' को आशियां अपना बनाना था
उस ठूंठ से परिंदों ने घोंसले हटा लिये.

         - आकर्षण कुमार गिरि

दिवाली... संघर्षों का जश्न....

एक अकेले दीपक से दिवाली नहीं होती। दिवाली होती है अनगिन छोटे छोटे दीयों से। अंधेरे को दूर तो कोई भी भगा सकता है। बल्ब, ट्यूब, एलई...