मैं तारों से निभाना चाहता हूँ.
मशीयत से कहो चाहे न मुझको
ज़मीन पर घर बनाना चाहता हूँ
ये दम है कि निकलता ही नहीं
मैं एक वादा निभाना चाहता हूँ.
मुझे बेकद्र दुनिया क्योंकर समझे
ज़माने को बदलना चाहता हूँ.
मुझे मंजिल से प्यारे हैं, वो सारे मील के पत्थर। बिना भटके मुझे जो तेरे दर तक लेकर आए हैं। भटकते फिर रहे कितने तुम्हारे चाहने वाले गले में बा...
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