शुभंकर गिरि

Saturday, July 24, 2010

हर रात बदलती रही हर ख्वाब बदलते रहे

आरज़ू थी कि न बदलूं और बदल जाऊं मैं
एक ही घर में रहे, कमरे बदलते रहे.



हर राह से गुजरूं, तमन्ना मेरे मन की थी
चंद कदम के बाद हम हर राह बदलते रहे.



क्या कहोगे उसको जिसकी जिंदगी की महफ़िल में
हर ताल बदलती रही, हर साज़ बदलते रहे.



महफ़िल में तेरे शेर न गाऊं तो क्या करूं
मिलते रहे तुम सबसे और हर बात बदलते रहे.



कैसे साकार करोगे अपने सपनों को ऐ 'गिरि'
हर रात बदलती रही हर ख्वाब बदलते रहे.

       - आकर्षण कुमार गिरि

1 comment:

वो जो इक तीर सा तेरी नजर से निकला था।।

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