शुभंकर गिरि

Thursday, April 7, 2011

जहां दुनिया सहमती है, दिवाना कर गुजरता है

कभी तुमसे शिकायत की, कोई सूरत नहीं होती
कि.. मैं जब मैं नहीं होता, तो.. तुम तुम भी नहीं होती
तमाशा जिन्दगी
में वक्त के साये में होता है
कि जब सूरज नहीं होता है, परछाईं नहीं होती

न वो तेरी कहानी है, न वो मेरी कहानी है
जिसे सब इश्क कहते हैं, वो किस्सा-ए-नादानी है
सुना है इश्क के किस्सों पे वो चर्चा नहीं होती
कहीं कान्हा नहीं रोता, कहीं राधा नहीं रोती



नजर आबाद होती है, तो दिल बर्बाद होता है
जिगरवालों की बस्ती में, तमाशा खूब होता है
  मैं तुझसा भी बन सकता था ऐ साथी, मगर सुन ले
जहां दुनिया सहमती है, दिवाना कर गुजरता है

                                               आकर्षण

13 comments:

  1. की जब मैं मैं नहीं होता तो
    तुम तुम भी नहीं होती..
    जहाँ दुनिया सहमती है
    दीवाना कर गुजरता है...
    वाह.. क्या खूब लिखा है...पूरी रचना ही गहरे अर्थों से ओतप्रोत है..

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  2. आपके ब्लॉग पे आया, दिल को छु देनेवाली शब्दों का इस्तेमाल कियें हैं आप |
    बहुत ही बढ़िया पोस्ट है
    बहुत बहुत धन्यवाद|

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  3. ALOTS OF THANK....
    NICE POST...
    KEEP IT UP>>>>

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  4. bahut sunder ...dil se likha aapne

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  5. आप सभी बंधुओं का तहेदिल से शुक्रिया....

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  7. शब्द और भाव की दृष्टि से आपकी रचना अनूठी है...आपके ब्लॉग का नाम बहुत दिलकश और सब से हट कर है जो बहुत पसंद आया...ऐसे ही लिखते रहें. शुभकामनाओं सहित
    नीरज

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  8. badhiya likhte hain aap ! pyar se pare duniya ko dekhiye.... bahut sarthak likehnge aap !

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  9. बहुत ही बढ़िया पोस्ट है| धन्यवाद|

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  10. जहाँ दुनिया सहमती है
    दीवाना कर गुजरता है...
    वाह.. क्या खूब लिखा है..

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  11. बहुत खूब लिखा है आपने.
    आपके शब्द दिल को छू रहे हैं.
    आपकी कलम को ढेरों सलाम.

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  12. बहुत खूब लिखा है आपने.
    आपके शब्द दिल को छू रहे हैं.
    आपकी कलम को ढेरों सलाम.

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