शुभंकर गिरि

Monday, December 5, 2016

उस तीर का स्वागत है जिस पे नाम मेरा है लिक्खा

कभी कातिल, कभी महबूब
कभी मसीहा लिक्खा। 
हमने उनको बेखुदी में 
खुद न जाने क्या  लिक्खा।।


इम्तिहाने जीस्त में हासिल सिफर
पर क्या गिला?
उसको उतने अंक मिले 
जिसने जैसा परचा लिक्खा।।


लाखों दस्तक पर भी तेरा 
दरवाजा तो बंद रहा।
जाते जाते दर पे तेरे
अपना नाम पता  लिक्खा।।


यूं रदीफो काफिया, मिसरे 
हमें मालूम थे।
तुम न समझोगे कि क्यों 
हर शेर को मक्ता लिक्खा??


मेरी मंजिल की दुआ
दिन रात रहती है यही।
पढ़ न पाऊँ मैं उसे
जो मील के पत्थर पे लिक्खा।।



अपनी आदत है नहीं 
मेहमान से मुख मोड़ना।
उस तीर का स्वागत है 
जिस पे नाम मेरा है लिक्खा।।


गीत, गज़लें या रुबाई
तुम जो चाहो सो कहो।
एक मोहब्बत ही लिखा 
और 'गिरि' ने क्या लिखा?

                                            - आकर्षण कुमार गिरि।


Sunday, October 30, 2016

है वही उन्वान, लेकिन रोशनाई और है........

चिट भी उसकी, पट उसी की,
सब सियासी तौर है।
कह रही है कुछ जबां,
लेकिन कहानी और है।।

था वही, जिसकी इबादत में
जहां पाबोस था।
और, हम समझे कि
दुनिया की खुदाई और है।।

मैं सहन करता रहा हंस हंस के
सब जुल्मो सितम।
वो तो खुद कुछ और,
उनकी बेहयाई और है।।

नींद गहरी है मगर,
अब रात हर बेख्वाब से।
है वही चादर, मगर
अब चारपाई और है।।

दाग छुप जायेंगे,
दीवार पुत जाने के बाद।
घर की पुताई और है,
सच की पुताई और है।।

कहने को तो सब कहते हैं-
दुनिया मेरे ठेंगे पर।
जग की परवाह और है
जग की हंसाई और है।।

गीतों में 'गिरि' के अब भी,
है तपिश उस प्यार की।
है वही उन्वान लेकिन,
रोशनाई और है।।

Tuesday, December 29, 2015

तू उससे आंख मिला, बातचीत जारी रख......

अपनी आंखों में 

हसीं ख्वाब की स्याही रख।

बहुत प्यासा है तू

पास एक सुराही रख।।




तेरी मंजिल की हदें 

तुझसे ही गुजरती हैं।

एक मुसाफिर है तू

तू अपना सफर जारी रख।।


वो न लहरों में कभी डूबा है

न कभी डूबेगा।

तू हिफाजत से रहेगा

तू उससे अपनी यारी रख।।




उसने बड़े ही करीने से 

बनाई ये दुनिया।

ये तुझपे है कि 

उस दुनिया की तू सफाई रख।।




हमसे बिछड़ोगे तो 

आधे ही कहे जाओगे।

मुकम्मल दासतां के वास्ते 

तू मुझसे यारी रख।।


खूब हंस-हंस के फरेब देते हैं 

ये दिलवाले।

या तो तू दिल को संभाल

या तो तू अय्यारी रख।।




ऐसी क्या बात हुई 

मुझसे खफा बैठे हो।

कभी तो ऐसा हो

मेरी साफगोई की कदर भी रख।।


वो दिलफरेब है

करता है बात बस हल्की।

तू उससे कुछ न कह

अपनी निगाह भारी रख।।




'गिरि' की आंखों में 

इक खुशबू है तेरे चाहत की।

तू उससे आंख मिला

बातचीत जारी रख।।

                                     - आकर्षण कुमार गिरि।


Wednesday, July 29, 2015

इक घोंसले के वास्ते, परवाज़ कितनी चाहिये......

फिर बना लूं इक नयी 

कागज की कश्ती आज भी।

है कला वो याद

पर गुज़रा ज़माना चाहिये।।


तेरे घर के सामने

 एक घर बनाने के लिये।

सिर्फ पैसा ही नहीं

एक प्लॉट खाली चाहिये।।


सीखना है कुछ अगर

इन पंछियों से सीखिये।

तिनका-तिनका कर के ही

एक घर बनाना चाहिये।।



लब को सी लें, अश्क पी लें

और उफ्फ भी ना करें।

है बहुत मुश्किल... मगर

दिल बाज़ जाना चाहिये।।


क्या करें क्या ना करें

ग़र ऐसी उलझन हो कभी।

क्या करें की सोच... 

बाकी भूल जाना चाहिये।।


सामने मंजिल अगर

खुद से बड़ी लगने लगे।

छोड़ कर हर राह

सीधे घर को जाना चाहिये।।

चोंच में तिनका दबाकर, 
'गिरि" उड़ते हो क्यों?

इक घोंसले के वास्ते

परवाज़ कितनी चाहिये?

                - आकर्षण कुमार गिरि।

Thursday, July 16, 2015

जब समझोगे, तब समझोगे.......


बेदर्द सवालों के मतलब

जब समझोगे तब समझोगे।

दुखती रग क्योंकर दुखती है

जब समझोगे तब समझोगे।।





रुखे-सूखे रिश्ते-नाते

और मरासिम मद्धम से।

इनसे होकर कैसे गुजरें

जब समझोगे तब समझोगे।।




एक और एक ग्यारह भी है

एक और एक सिफर भी है।

ये अहले सियासी बातें हैं

जब समझोगे तब समझोगे।।



मंजिल के आने से पहले

मैं क्यों थक कर बैठ गया?

मंजिल भी दूर छिटकती है

जब समझोगे तब समझोगे।।


दिल से दिल को मिलाना होगा

आंख मिलाने से पहले।

ये है बुनियादी बात मगर

जब समझोगे तब समझोगे।।



बदनामी को मोल लिया

हर ताने पर साधी चुप्पी।

मेरी खामोशी का मकसद,

जब समझोगे तब समझोगे।।


हमने तुमको हमदम जाना

तुमने हमको बेच दिया।

'गिरि' के मोल को क्या जानो

जब समझोगे तब समझोगे।।
                                          

                                                    -आकर्षण कुमार 'गिरि'
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