शुभंकर गिरि

Tuesday, May 30, 2017

वो जो इक तीर सा तेरी नजर से निकला था।।


छोड़के मुझको मेरे दर से जब तू निकला था।
जैसे आकाश फटे, खूं जिगर से निकला था।।

किसी की न सुनी, सब की जान ले के गया।
वो जो इक तीर सा तेरी नजर से निकला था।।

सदियों तक मेरे जेहन में गूंजता ही रहा।
कठिन सवाल सा, जो लब से तेरे निकला था।।

मेरी आँगन में अँधेरा, जग को रोशन कर गया।
वो जो जुगनू सा कल ही, मेंरे घर से निकला था।।

वो क्या ख़ाक बतायेगा, किस सिम्त शम्स डूबेगा?
जिसे खबर ही नहीं, सूरज किधर से निकला था।।

भोले भाले गिरिजी से क़त्ल किसी का क्या होगा?
सच है वो ही खंजर लेकिन, उनके घर से निकला था।।

     
                         -आकर्षण कुमार गिरि।

Monday, May 8, 2017

मुझे खुद को कहार करना था.......

मुझसे थोड़ा तो प्यार करना था।
एक बार ऐतबार करना था।।

दिल को बस जार जार करना था।
कुछ तो ऐसे निबाह करना था।।

साथ रिश्तों का ऐतबार लिये।
हमको ये दश्त पार करना था।।

जमीं पर उतर के चाँद आये।
ऐसी शब् का चुनाव करना था।।

गम-ए-दौरां बिठा के डोली में।
रोज खुद को कहार करना था।।

याद में जो कटी, कटी ना कटी।
वैसी हर शब् से प्यार करना था।।


दिल जो हल्का हुआ तो याद आया।
तेरी मर्जी से आह भरना था।।

रूह को भी करार आ जाए।
कोई ऐसा करार करना था।।

गैर में ऐब ढूंढने वाले।

कुछ तो खुद में सुधार करना था।।

क्यों आस्तीन चढ़ी हुई है तेरी।
क्या मुझसे आर पार करना था।।

बोल तेरे थे क्यों कर मिसरी की डली थी।
शायद 'गिरि' पर और प्रहार करना था।।

                 - आकर्षण कुमार गिरि

Monday, December 5, 2016

उस तीर का स्वागत है जिस पे नाम मेरा है लिक्खा

कभी कातिल, कभी महबूब
कभी मसीहा लिक्खा। 
हमने उनको बेखुदी में 
खुद न जाने क्या  लिक्खा।।


इम्तिहाने जीस्त में हासिल सिफर
पर क्या गिला?
उसको उतने अंक मिले 
जिसने जैसा परचा लिक्खा।।


लाखों दस्तक पर भी तेरा 
दरवाजा तो बंद रहा।
जाते जाते दर पे तेरे
अपना नाम पता  लिक्खा।।


यूं रदीफो काफिया, मिसरे 
हमें मालूम थे।
तुम न समझोगे कि क्यों 
हर शेर को मक्ता लिक्खा??


मेरी मंजिल की दुआ
दिन रात रहती है यही।
पढ़ न पाऊँ मैं उसे
जो मील के पत्थर पे लिक्खा।।



अपनी आदत है नहीं 
मेहमान से मुख मोड़ना।
उस तीर का स्वागत है 
जिस पे नाम मेरा है लिक्खा।।


गीत, गज़लें या रुबाई
तुम जो चाहो सो कहो।
एक मोहब्बत ही लिखा 
और 'गिरि' ने क्या लिखा?

                                            - आकर्षण कुमार गिरि।


Sunday, October 30, 2016

है वही उन्वान, लेकिन रोशनाई और है........

चिट भी उसकी, पट उसी की,
सब सियासी तौर है।
कह रही है कुछ जबां,
लेकिन कहानी और है।।

था वही, जिसकी इबादत में
जहां पाबोस था।
और, हम समझे कि
दुनिया की खुदाई और है।।

मैं सहन करता रहा हंस हंस के
सब जुल्मो सितम।
वो तो खुद कुछ और,
उनकी बेहयाई और है।।

नींद गहरी है मगर,
अब रात हर बेख्वाब से।
है वही चादर, मगर
अब चारपाई और है।।

दाग छुप जायेंगे,
दीवार पुत जाने के बाद।
घर की पुताई और है,
सच की पुताई और है।।

कहने को तो सब कहते हैं-
दुनिया मेरे ठेंगे पर।
जग की परवाह और है
जग की हंसाई और है।।

गीतों में 'गिरि' के अब भी,
है तपिश उस प्यार की।
है वही उन्वान लेकिन,
रोशनाई और है।।

Tuesday, December 29, 2015

तू उससे आंख मिला, बातचीत जारी रख......

अपनी आंखों में 

हसीं ख्वाब की स्याही रख।

बहुत प्यासा है तू

पास एक सुराही रख।।




तेरी मंजिल की हदें 

तुझसे ही गुजरती हैं।

एक मुसाफिर है तू

तू अपना सफर जारी रख।।


वो न लहरों में कभी डूबा है

न कभी डूबेगा।

तू हिफाजत से रहेगा

तू उससे अपनी यारी रख।।




उसने बड़े ही करीने से 

बनाई ये दुनिया।

ये तुझपे है कि 

उस दुनिया की तू सफाई रख।।




हमसे बिछड़ोगे तो 

आधे ही कहे जाओगे।

मुकम्मल दासतां के वास्ते 

तू मुझसे यारी रख।।


खूब हंस-हंस के फरेब देते हैं 

ये दिलवाले।

या तो तू दिल को संभाल

या तो तू अय्यारी रख।।




ऐसी क्या बात हुई 

मुझसे खफा बैठे हो।

कभी तो ऐसा हो

मेरी साफगोई की कदर भी रख।।


वो दिलफरेब है

करता है बात बस हल्की।

तू उससे कुछ न कह

अपनी निगाह भारी रख।।




'गिरि' की आंखों में 

इक खुशबू है तेरे चाहत की।

तू उससे आंख मिला

बातचीत जारी रख।।

                                     - आकर्षण कुमार गिरि।


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