शुभंकर गिरि

Sunday, June 14, 2015

शायद वो भी हमदम निकले......

तुम माटी के पुतले निकले।

सोच से बिल्कुल उल्टे निकले।।


मंजिल उनके सजदे करती।

जो भी घर से बाहर निकले।।


अपने ग़म को बांध के रख लो।

शायद अरमां अब कम निकले।।


घर की जानिब जिनका रुख था।

वो ही सबसे बेहतर निकले।।


उसको चल कुछ कह कर निकलें।

शायद वो भी हमदम निकले।।


तुम थे... मैं था... ठीक ही था।

तीसरे शायद मौसम निकले।।


महफिल को बेनूर है होना।

हम निकलें या.. हमदम निकले।।


शफक तुम्हारे कदमों में है।

लेकिन 'गिरि' को अब पर निकले।।


    - आकर्षण।

वो जो इक तीर सा तेरी नजर से निकला था।।

छोड़के मुझको मेरे दर से जब तू निकला था। जैसे आकाश फटे, खूं जिगर से निकला था।। किसी की न सुनी, सब की जान ले के गया। वो जो इक तीर सा...