मुझे मंजिल से प्यारे हैं, वो सारे मील के पत्थर।
बिना भटके मुझे जो तेरे दर तक लेकर आए हैं।
भटकते फिर रहे कितने तुम्हारे चाहने वाले
गले में बांध रखे हैं जिन्होंने मील के पत्थर।
मुझे मंजिल से प्यारे हैं, वो सारे मील के पत्थर।
बिना भटके मुझे जो तेरे दर तक लेकर आए हैं।
भटकते फिर रहे कितने तुम्हारे चाहने वाले
गले में बांध रखे हैं जिन्होंने मील के पत्थर।
खुद पे तीर चलाया हमने
जाम-ए-लहू छलकाया हमने।
अपने अंदर तुझको पाकर
खुद को ही बहलाया हमने।
तेरी सूरत चस्पा कर ली
तुझको रत्ती भर न पाया
"इतना साथ निभाया हमने।"
लहरों में भर-भर आंसू थे
दरिया को सहलाया हमने।
शबनम के जलते अश्कों से
अपना हाथ जलाया हमने।
एक फूँक में शमा बुझा कर
यौम-ए -ज़ख्म मनाया हमने।
इस दुनिया से जाते जाते
तेरा दर खड़काया हमने।
आज अदावत खत्म हुई तो
खुद से हाथ मिलाया हमने।
खुद को स्वाहा करते करते
मसले को सुलझाया हमने।
बात ये आम नहीं, बात दिगर है साईं
सिर्फ़ दामन ही नहीं, चाक जिगर है साईं
इश्क़ से मैं भी हूँ, तुम भी हो, ज़माना भी है
इश्क़ बिन जग में भला किसका बसर है साईं
तेरी आँखों से जुड़ा है मेरी साँसों का सफ़र
हर घड़ी तेरी निगाहों पे नज़र है साईं
राह वो है जहाँ क़दमों के निशाँ तक न मिलें
‘घर वही है दिले-दीवाना जिधर है साईं’
साफ़ कहिये न सही कोई इशारा दीजे
राह किस ओर है, किस सिम्त सफ़र है साईं
आग दुनिया की बुझे, पलकें झुका लूँ जो मैं
ये मेरी सर्द निगाही का असर है साईं
मौत की मेरी ख़बर ही नहीं क़ातिल को मिरे
पहले पन्ने पे अगरचे कि ख़बर है साईं
क्यों ज़माने में फ़कत तेरा मकाँ रोशन हो
तेरी मेरी ही नहीं सबकी सहर है साईं
गुलो-गुलशन को ग़मज़दा करके।
तुमने पाया है ऐसा क्या करके।
मैं यकीनन ही लौट आऊंगा
मौत से एक मशविरा करके।
ज़ीस्त है तो कज़ा भी आनी है
आएगी बस जरा जरा करके।
मुझसे नजरें मिला ओ चारागर
क्या मिला मुझको बेदवा करके?
चांद तारों से गुफ्तगू कैसी?
कुछ न होगा यूं रतजगा करके।
मौत से मुंह छुपा नहीं सकते
तुम जियो दिल को बस जवाँ करके।
कोई आता नहीं है पुरसिश को
'हमने देखा है तज्रबा करके।'
इश्क में खुद को गमजदा करके
हम हुए पाक इक खता करके।
इश्क मतलब ही दर्द है, लेकिन
हम भी देखेंगे तर्जुमा करके।
हम नुमायाँ हुए ज़माने में
तेरे चेहरे को आईना करके।
मैं मरूं तुझपे, तू मरे मुझपे
हम जिएं जीस्त सरगिरां करके।
बेअसर मेरी बददुआएं हों
रब से मांगूंगा ये दुआ करके।
देखिये रंग क्या दिखाता है?
गया अभी जो मरहबा करके।
उसके सजदे में हम पाबोस रहे
इश्क में बुत को ही खुदा करके।
इब्तिदा इश्क है, अंजाम नहीं
'हमने देखा है तज्रबा करके।'
हम बड़े ढीठ हो गए हैं अब
वाकई आपसे वफ़ा करके।
जानेमन तुमको जानेजां करके
हम चले जायेंगे वफ़ा करके।
इश्क जादू है, इश्क टोना है
रिंद को रख दे पारसा करके।
दर्द कोने में छिप के बैठा था
रख दिया तूने सर-ए-पा करके।
खुदा को मुंह दिखा नहीं सकते
किसी बच्चे का दिल दुखा करके।
इश्क में मुंह छुपाना पड़ता है।
'हमने देखा है तज्रबा करके।'
'गिरि' को आप कैसे समझेंगे?
उसके शेरों को फलसफा करके।
मिली बदनामियां मुझको मुझी से
जो गुजरे हम तेरी घर की गली से।
जमीं पर तब मोहब्बत भी नहीं थी
तेरी चाहत हमें है उस घड़ी से।
न कह पाओ, निगाहों से बता दो
गिला बेहतर है, दिल की बेकली से।
मैं कांधे पे उठा लेता हूं हल को।
फसल उगती नहीं आवारगी से।
किसानी में कहां बरकत है यारों?
फसल पकती है अश्कों की नमी से।
मोहब्बत में बहुत लिखा है लेकिन
ये घर चलता नहीं है शायरी से।
सुबह से शाम तक फाकाकशी है
'मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।'
खुदा ही जब खताएं कर रहे हैं।
शिकायत क्या करेंगे वो 'गिरि' से।
अदावत है मोहब्बत की कमी से।
शराफत मिट गई जग की बही से।
कथा कैसे कहें अपनी किसी से।
मोहब्बत थी हमें एक अजनबी से।
तुम्हें जाना था पीछे की गली से।
तो क्यों आए थे आगे की गली से।
तआर्रुफ कर तो लूं तेरी गली से।
सफर होगा शुरू अगली सदी से।
मुसाफिर हम रहे पिछली सदी से
सफर कटता नहीं आवारगी से।
समाती ही नहीं ये डायरी में।
'मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।'
दुआ अब आखिरी कीजे खुदा से।
लहू रुकता नहीं अब फ़िटकरी से।
तखल्लुस में परेशानी न होती।
ग़ज़ल लिखते अगर संजीदगी से।
वो तड़पेगा मोहब्बत की कमी से
जो जलता है निगाहों की नमी से।
यही दस्तूर है सदियों सदी से
समंदर खुद नहीं मिलता नदी से।
मिलन का बोझ सारा है नदी पे
जो बहती अनवरत अपनी खुशी से।
निभाएं इस कदर रिश्ता सभी से
समंदर ना नहीं कहता नदी से।
तुम्हें करना है क्या ये तुम जानो
शिकायत ना करेंगे हम किसी से।
वज़न काबू में आता ही नहीं है
मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।
मुझे तुम मिल गए हो जिंदगी में
गिला क्यों कर करेंगे मुफलिसी से।
गिरि तुमको कोई न समझेगा
करो शिकवा मगर संजीदगी से।
मुखातिब हो गया हूं आदमी से।
मोहब्बत हो गई है जिंदगी से।
दुआओं में असर उसके नहीं है।
दुआ देता है वो, पर बेदिली से।
मोहब्बत का नया दस्तूर है ये।
नहीं मिलता यहां कुछ बंदगी से।
गुनाहों को किसी के नाम करता।
मेरा चेहरा नहीं मिलता किसी से।
कोई कितना भी चाहे सर पटक ले।
ये मसला हल नहीं होगा किसी से।
यही हासिल हुआ आवारगी में।
मसाफ़त हो गई उसकी गली से।
बहुत मरता हूं पर मरता नहीं मैं।
मुझे नफरत हुई है खुदकुशी से।
खता कुछ हो गई होगी हमीं से।
ये होती रहती है हर आदमी से।
बहर में कैद कर दिया मुझको।
'मैं आज़िज आ गया हूं शायरी से।'
न बैठो इस कदर संजीदगी से।
'गिरिजी' तब निभेगी जिंदगी से।
साथ अपने ये फलसफा रखना।
मिलने जुलने में फासला रखना।
जिंदा हो तुम, यकीन करने को।
"सामने अपने आईना रखना।"
ख्वाब आंखों में अल्हदा पालो।
आसमानों से राब्ता रखना।
वो जो दिल के करीब रहता है
जान ले लेगा, हौसला रखना।।
कश्तियां राह भी भटकती हैं।
एक तारा निगाह में रखना।
आवले अब न बात मानेंगे
साथ में दर्द की दवा रखना।
मेरी सोहबत में कुछ न पाओगे
दोस्त मुझसा कभी नहीं रखना।
जब कभी घर से दूर जाना हो
घर की खुशबू को पास में रखना।
खुद पे काबू नहीं रहे जब भी
दूर होठों से बददुआ रखना।
जब भी आओ गरीबखाने में
पहले दायां कदम सदा रखना।
कल ये गीतों का काफिला होंगे
ज़ख्म अपने सम्भाल कर रखना।
चांद तारों को छू के आने को
गिरि के सर पे अपने पा रखना।
- आकर्षण कुमार गिरि
जो मन में गांठ रखता है, सरल वो हो नहीं सकता।
जो विषधर है, भुवन में वो अमर हो ही नहीं सकता।।
सरल है जो- ज़माने में अमर वो ही सदा होगा।
गरल जो पी नहीं पाया, सरल वो हो नहीं सकता।।
-आकर्षण कुमार गिरि
शराफत से नहीं होंगे, शरारत से नहीं होंगे।
ज़मानत से नहीं होंगे, अदालत से नहीं होंगे।
अदावत से नहीं होंगे, बगावत से नहीं होंगे।
मोहब्बत के ये मसले हैं, मोहब्बत से ही हल होंगे।।
- आकर्षण कुमार गिरि ।
एक कहानी जिंदगी एक और तुम
फिर वही झूठी कहानी और तुम।
इश्क़,ग़म,सारे फ़साने बोझ हैं
एक जीवन,आरजू एक, और तुम।
ये कोई इल्जाम से कुछ कम था क्या?
रात,तन्हाई,तेरी यादें निगोड़ी और तुम।
फलसफों से बोझ कम होता नहीं।
दिल को संबल चाहिए एक, और तुम।
'गिरि' के अश्आरों सी बेहद खूबसूरत
सारे मक्ते एक तरफ, एक ओर तुम।
- आकर्षण कुमार गिरि।
मुझे मंजिल से प्यारे हैं, वो सारे मील के पत्थर। बिना भटके मुझे जो तेरे दर तक लेकर आए हैं। भटकते फिर रहे कितने तुम्हारे चाहने वाले गले में बा...