इश्क़ है गर तो मुझे ख़ुद में ही शामिल समझें,
दिले-नाचीज़ को अपने ही दिल का दिल समझें।
कौन कहता है कि मेहनत का सिला मिलता है,
मेरी ग़ुरबत से मुझे आप न काहिल समझें।
मैं अँधेरों में हूँ, साया भी नहीं साथ मेरे,
आप तो दोस्त हैं मेरे, मेरी मुश्किल समझें।
मेरे माथे पे जो चस्पाँ है, फ़क़त तोहमत है,
उसको काजल नहीं, क़िस्मत या कोई तिल समझें।
दर्द-ए-रुस्वाई को सहते हैं वो हरदम हँसकर,
अश्क को मौज औ पलकों को जो साहिल समझें।
आपसे बात हुई, सो न सके हम शब भर,
आप ख़ुद को न मेरे ख़्वाब का क़ातिल समझें।
जान उसकी भी गई, मैं भी तो बेजान हुआ,
इल्तिजा है कि मुझे आप न क़ातिल समझें।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें