शुभंकर गिरि

Saturday, September 24, 2011

तुम्हें मक्ता बनाना चाहता हूं

नया कुछ कर दिखाना चाहता हूं
तुम्हें मैं आज़माना चाहता हूं .

ग़ज़ल अबतक अधूरी रह गई है
तुम्हें मक्ता बनाना चाहता हूं .

तेरी हसरत की सुई चुभ रही है
मैं इक धागा पिरोना चाहता हूं .



ज़माना उसकी बातें कर रहा है
जिसे अपना बनाना चाहता हूं .

'गिरि' अब यूं नहीं खामोश रहिए
मैं इक किस्सा मुकम्मल चाहता हूं .

-आकर्षण कुमार गिरि


23 comments:

  1. गिरी जी मकता तो बहुत खुबसूरत बना है और पूरी ग़ज़ल गजब वाह वाह

    ReplyDelete
  2. आकर्षण जी बहुत अच्छी ग़ज़ल है . एक गुज़ारिश है की कठिन उर्दू शब्दों के अर्थ भी नीचे लिख दें तो हम जैसों के लिए समझना आसान हो जायेगा

    ReplyDelete




  3. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  4. उम्दा और बेहतरीन .शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  5. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  6. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  7. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  8. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  9. हर शेर बेहतरीन...
    उम्‍दा गजल।
    आभार आपका......

    ReplyDelete
  10. अच्छी गजल ...बहुत बहुत बधाई

    ReplyDelete
  11. वाह गिरी भाई...धारदार॥/

    ReplyDelete
  12. आपकी लेखनी में एक जादू है जो किसी अपरिचित को अपनी ओर खिंच ही लती है | धन्यवाद |VISIT HERE... http://www.akashsingh307.blogspot.com/

    ReplyDelete
  13. वाह!
    बहुत शानदार ग़ज़ल प्रस्तुत की है आपने!
    आश्चर्य है कि अब तक मेरी नज़र से यह ब्लॉग ओझल क्यों रहा?

    ReplyDelete
  14. बहुत खूब ...
    शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  15. भावनाओ और शब्दों का अद्दभुत समन्वय
    बहुत खूब

    ReplyDelete
  16. ग़ज़ल अब तक अधूरी थी
    तुम्हें मक्ता बनाना चाहता हूँ .....

    क्या बात है ....
    आप यूँ ही मक्ता बनाते रहिये ग़ज़ल भी एक दिन बन जाएगी .....

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...