शुभंकर गिरि

Tuesday, November 2, 2010

महंगाई और चांद-1

इस कमरतोड महंगाई में
जबसे रोटी का जुगाड दूभर हुआ है
कवियों ने चांद में रोटी देखना शुरू कर दिया
और अब.....
धुंधला सा चांद 
अपना पता बताने से डरने लगा है.....

दिवाली... संघर्षों का जश्न....

एक अकेले दीपक से दिवाली नहीं होती। दिवाली होती है अनगिन छोटे छोटे दीयों से। अंधेरे को दूर तो कोई भी भगा सकता है। बल्ब, ट्यूब, एलई...