शुभंकर गिरि

Monday, February 14, 2011

चुभती साँसें मत देखा कर

ख्वाब पुराने मत देखा कर
धुंधली यादें मत देखा कर

और भी दर्द उभर आयेंगे 
दिल के छाले मत देखा कर

जीवन में पैबंद बहुत हैं
मूँद ले आँखें मत देखा कर

अपने घर कि बात अलग है
औरों के घर मत देखा कर 

कहने वाले बस कहते हैं 
दिन में सपने मत देखा कर

जीवन का जब जोग लिया है
चुभती साँसें मत देखा कर
- आकर्षण


12 comments:

  1. और भी दर्द उभर आयेंगे ......... क्या बात है दिल से निकली बात अच्छी लगी ...

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  2. खुबसुरत रचना है। आभार।

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  3. bahut khoob , kuchh cheejen aisi hoti hain ...aankh moondni padtee hai ...

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  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  5. आप सबकी टिप्पणियों से निश्चित ही हौसलाफजाई हुई है. कोशिश करूंगा की आप सबों की उम्मीदों पर मैं खरा उतर सकूं. वैसे दिल की लिखी बातों को दिल की बातों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

    - आकर्षण

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  6. खुबसुरत रचना....

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  7. जीवन का जब जोग लिया है, चुभती साँसे मत देखा कर...
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, दिल से निकली और दिल को छूती रचना..

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  8. अपने घर की बात अलग है
    ओरों के घर मत देखा कर ...

    वक्त के साथ भावनात्मक समन्वय स्थापित करती आपकी यह रचना सुंदर सन्देश का सम्प्रेषण भी करती है ...आपका लेखन अनवरत जारी रहे यही कामना है

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