मंगलवार, 20 जुलाई 2010

रोज़, हर रोज़ हम बदलते रहे....

जिंदगी से निबाह करते रहे.
रोज़, हर रोज़ हम बदलते रहे.

दुश्मनों से सदा निभाते रहे.
दोस्तों से फ़रेब करते रहे.

पग पग पे बिछी थी कोई शतरंजी बिसात.
कभी प्यादा, कभी घोड़े की तरह चलते रहे.

कोइ क्योंकर मेरा स्थायी पता मांगे है.
घर किराए का था - हर रोज़ बदलते रहे.

कोई कहता था कि पत्थर के हो तुम.
तुझको हम रोज़ पूजते ही रहे.

मैं भला कैसे समझ पाता तुझे.
तुम तो हर रोज़ रंग बदलते रहे.

तेरी दुआओं में है गज़ब का असर.
 और हम रोज़ अपनी जान से गुजरते रहे.

आवारगी ने "गिरि" तुम्हें मशहूर कर दिया.
रास्ते के हो गये, किसी मंज़िल के न रहे.




1 टिप्पणी:

रख दिया तूने सर-ए-पा करके....

जानेमन तुमको जानेजां करके हम चले जायेंगे वफ़ा करके। इश्क जादू है, इश्क टोना है रिंद को रख दे पारसा करके। दर्द कोने में छिप के बैठा था रख दिया...