शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

उलझते जायेंगे सुलझे हुए हम

 ख़ुद अपनी घात में बैठे हुए हम

ज़बां के तीर हैं छूटे हुए हम


जिगर तक आपके पहुँचेंगे कैसे

नज़र से आपकी उतरे हुए हम


महब्बत में सियासत कर रहे हो ?

उलझते जायेंगे सुलझे हुए हम


बतायें क्या सियासत के सलीक़े

शराफ़त छोड़ के अच्छे हुए हम 


यक़ीनन हम ग़लत रस्ते पे होंगे

सफ़र में आपसे बिछड़े हुए हम


शबे-हिज्राँ कहूँ कैसे कटी थी

कभी शबनम कभी शोले हुए हम


हसीं दामन पे जैसे छींट कोई

चमन में आपके उजड़े हुए हम


ज़ियारत आज पूरी हो गई है

सो क़ाबिल दीद के तेरे हुए हम

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

दिले-नाचीज़ को अपने ही दिल का दिल समझें

इश्क़ है गर तो मुझे ख़ुद में ही शामिल समझें,

दिले-नाचीज़ को अपने ही दिल का दिल समझें।


कौन कहता है कि मेहनत का सिला मिलता है,

मेरी ग़ुरबत से मुझे आप न काहिल समझें।


मैं अँधेरों में हूँ, साया भी नहीं साथ मेरे,

आप तो दोस्त हैं मेरे, मेरी मुश्किल समझें।


मेरे माथे पे जो चस्पाँ है, फ़क़त तोहमत है,

उसको काजल नहीं, क़िस्मत या कोई तिल समझें।


दर्द-ए-रुस्वाई को सहते हैं वो हरदम हँसकर,

अश्क को मौज औ पलकों को जो साहिल समझें।


आपसे बात हुई, सो न सके हम शब भर,

आप ख़ुद को न मेरे ख़्वाब का क़ातिल समझें।


जान उसकी भी गई, मैं भी तो बेजान हुआ,

इल्तिजा है कि मुझे आप न क़ातिल समझें।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

ख़ुदा जब सुनेगा गवाही मेरी

है बेबस बहुत बेकरारी मेरी

ख़बर में छपी है उदासी मेरी
जिसे देखिए देखने आ रहा
तमाशा बनी ज़िंदगानी मेरी?
सुदामा की चिंता किसी को कहाँ
सियासत ने छीनी है यारी मेरी
मुझे मार डालेगी ये मैकशी
हुई आज दुश्मन है साक़ी मेरी
तजुर्बा मोहब्बत का ज़्यादा नहीं
उमर है अभी बस नवासी मेरी।
गुनहगार उस दिन वो कहलाएगा
ख़ुदा जब सुनेगा गवाही मेरी

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

सलीबों पर रहे लटके हुए हम

 तेरी जुल्म- ओ सितम सहते हुए हम

सलीबों पर रहे लटके हुए हम


ज़िगर में जान की उतरेंगे कैसे?

जुबाँ फिसली, नज़र से गिर गए हम


कि जिस कालिब में चाहो ढाल लेना

तपिश में इश्क की पिघले हुए हम


रहे जिंदा तो सबको मारेंगे 

सियासी इश्क के मोहरे हुए हम


किसी की जान जाकर ही रहेगी

तेरे तरकश से हैं निकले हुए हम


जवाबों से तपिश ये कम न होगी

सवालों की तरह सुलगे हुए हम


न मंज़िल की, न रस्ते के हुए हम

सफ़र में इश्क के भटके हुए हम


खुदा हमको सदा महफूज रखे

खुद अपनी घात में बैठे हुए हम

बुधवार, 15 जुलाई 2026

मैं आशिक हूं, तेरी रिआया नहीं.....

मज़ा इश्क़ में, जान! आया नहीं
मिला दर्द दिल को करारा नहीं

पलीते में रोगन समाए बिना
चिराग़-ए-मोहब्बत तो जलता नहीं

ये काजल का टीका और तेरी दुआएँ
किसी से मुझे कोई ख़तरा नहीं

तुम्हें ही चुनेंगे जनम-दर-जनम
मैं आशिक़ हूँ, तेरी रिआया नहीं

लिफ़ाफ़े में इक फूल तू भेज दे
कलम पे तेरा ज़ोर चलता नहीं

जिएँ या मरें, तेरी मर्ज़ी से क्यों
मेरी ज़ीस्त तेरा खिलौना नहीं

हमारे सफ़ीने की क़ीमत लगा
पुराना है लेकिन खटारा नहीं

जिसे देखिए, भागता जा रहा
तिरे शहर में कुछ भी बदला नहीं

मोहब्बत है या फिर मोहब्बत नहीं
जहाँ में कोई और मसला नहीं

उलझते जायेंगे सुलझे हुए हम

 ख़ुद अपनी घात में बैठे हुए हम ज़बां के तीर हैं छूटे हुए हम जिगर तक आपके पहुँचेंगे कैसे नज़र से आपकी उतरे हुए हम महब्बत में सियासत कर रहे हो...