है बेबस बहुत बेकरारी मेरी
तमाशा बनी ज़िंदगानी मेरी?
सियासत ने छीनी है यारी मेरी
हुई आज दुश्मन है साक़ी मेरी
उमर है अभी बस नवासी मेरी।
ख़ुदा जब सुनेगा गवाही मेरी
है बेबस बहुत बेकरारी मेरी
तेरी जुल्म- ओ सितम सहते हुए हम
सलीबों पर रहे लटके हुए हम
ज़िगर में जान की उतरेंगे कैसे?
जुबाँ फिसली, नज़र से गिर गए हम
कि जिस कालिब में चाहो ढाल लेना
तपिश में इश्क की पिघले हुए हम
रहे जिंदा तो सबको मारेंगे
सियासी इश्क के मोहरे हुए हम
किसी की जान जाकर ही रहेगी
तेरे तरकश से हैं निकले हुए हम
जवाबों से तपिश ये कम न होगी
सवालों की तरह सुलगे हुए हम
न मंज़िल की, न रस्ते के हुए हम
सफ़र में इश्क के भटके हुए हम
खुदा हमको सदा महफूज रखे
खुद अपनी घात में बैठे हुए हम
तू दिरहम है, तू ही है दीनार मेरी
तू ही जीत है, तू ही है हार मेरी।
छुपा ले तू मुझको, बस अपने भँवर में
तू साहिल है, तू ही है मझधार मेरी।
तपाकर हमें पीटती है वो हरदम
हुई ज़िंदगी क्यों है लोहार मेरी।
तेरा फैसला आज ना-हक़ हुआ है
गिरी गेंद सीमा के है पार मेरी।
मुसीबत हमेशा ही चलती रहेगी
रहेगी सदा साथ दो चार मेरी।
मुक़द्दर! मुझे मौत की बस सज़ा दे
गवाही में उतरी है सरकार मेरी।
समेटेगी अश्कों को ये उम्र सारी
उदासी है बहुत होशियार मेरी।
तेरे हाथों में है पतवार मेरी
तुम्हीं रहबर, तुम्हीं रफ्तार मेरी।
वो आती औ चली जाती है ऐसे
कि जैसे फ़ुर्सत-ए-इतवार मेरी।
निगाहों से करूँ तनवीम तुमको
ये आंखें हैं बड़ी अय्यार मेरी।
ज़ीस्त को ही शराब करती है
नशे में रूह है सरशार मेरी।
कोई चिट्ठी न कोई तार मेरा
किसी को भी नहीं दरकार मेरी ।
ये सारे आंकड़े अपनी जगह पर
तुम्हीं बहुमत, तुम्हीं सरकार मेरी।
ये बहुमत मैं नहीं गंवा सकता
तुम्हीं पर है टिकी सरकार मेरी।
तबस्सुम को हिजाब करती है
उदासी है बहुत हुशियार मेरी।
सज़ा मेरी मुक़र्रर हो गई है
गवाही हो गई स्वीकार मेरी।
है बेबस बहुत बेकरारी मेरी ख़बर में छपी है उदासी मेरी जिसे देखिए देखने आ रहा तमाशा बनी ज़िंदगानी मेरी? सुदामा की चिंता किसी को कहाँ सियासत ...