गुरुवार, 16 सितंबर 2010

चाहनेवाले कमाल करते हैं

ज़ख्म दिल पर क़ुबूल करते हैं
अपनी रातें बबूल करते हैं

लब पे अब लर्ज़िश ए हसरत न रही
हम तेरे हैं गुरुर करते हैं

चाहतों में भले असर कम हो
चाहनेवाले कमाल करते हैं

जिंदगी से नहीं निभी उनकी
ज़ख्म को जो जुनून करते हैं

रोशनी के लिये कभी सूरज
राह तारों की नहीं तकते हैं

उनका हर लब्ज़ संभाल के रखना
वो तो हर बात पे मुकरते हैं

जब कभी पूछिये वस्ल ए जाना
'गिरि' ख्वाबों की बात करते हैं

दिले-नाचीज़ को अपने ही दिल का दिल समझें

इश्क़ है गर तो मुझे ख़ुद में ही शामिल समझें, दिले-नाचीज़ को अपने ही दिल का दिल समझें। कौन कहता है कि मेहनत का सिला मिलता है, मेरी ग़ुरबत से ...