शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

सलीबों पर रहे लटके हुए हम

 तेरी जुल्म- ओ सितम सहते हुए हम

सलीबों पर रहे लटके हुए हम


ज़िगर में जान की उतरेंगे कैसे?

जुबाँ फिसली, नज़र से गिर गए हम


कि जिस कालिब में चाहो ढाल लेना

तपिश में इश्क की पिघले हुए हम


रहे जिंदा तो सबको मारेंगे 

सियासी इश्क के मोहरे हुए हम


किसी की जान जाकर ही रहेगी

तेरे तरकश से हैं निकले हुए हम


जवाबों से तपिश ये कम न होगी

सवालों की तरह सुलगे हुए हम


न मंज़िल की, न रस्ते के हुए हम

सफ़र में इश्क के भटके हुए हम


खुदा हमको सदा महफूज रखे

खुद अपनी घात में बैठे हुए हम

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सलीबों पर रहे लटके हुए हम

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