जिसे शिद्दत से जब चाहा, वही हर बार छूटे हैं।ज़माना तब नहीं समझा, ज़माना अब क्या समझेगा?
कि तब हम छूट जाते थे, मगर अब टूट जाते हैं।
- गिरि
इश्क़ है गर तो मुझे ख़ुद में ही शामिल समझें, दिले-नाचीज़ को अपने ही दिल का दिल समझें। कौन कहता है कि मेहनत का सिला मिलता है, मेरी ग़ुरबत से ...