रविवार, 18 जुलाई 2010

तुम बहुत याद आये

कांपती कश्ती दिखी मझधार में
तुम बहुत याद बहुत याद बहुत याद आये.

बीती सदियों का जब हिसाब किया  
तुम बहुत याद बहुत याद बहुत याद आये.

आज फिर जीने कि ललक जागी है 
तुम बहुत याद बहुत याद बहुत याद आये.

उसने किसी और को ज़ालिम कहा 
तुम बहुत याद बहुत याद बहुत याद आये.

उस फ़साने में फिर से 'गिरि' का ज़िक्र था
और तुम बहुत याद बहुत याद बहुत याद आये. 

-आकर्षण कुमार गिरि

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रख दिया तूने सर-ए-पा करके....

जानेमन तुमको जानेजां करके हम चले जायेंगे वफ़ा करके। इश्क जादू है, इश्क टोना है रिंद को रख दे पारसा करके। दर्द कोने में छिप के बैठा था रख दिया...