शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

उलझते जायेंगे सुलझे हुए हम

 ख़ुद अपनी घात में बैठे हुए हम

ज़बां के तीर हैं छूटे हुए हम


जिगर तक आपके पहुँचेंगे कैसे

नज़र से आपकी उतरे हुए हम


महब्बत में सियासत कर रहे हो ?

उलझते जायेंगे सुलझे हुए हम


बतायें क्या सियासत के सलीक़े

शराफ़त छोड़ के अच्छे हुए हम 


यक़ीनन हम ग़लत रस्ते पे होंगे

सफ़र में आपसे बिछड़े हुए हम


शबे-हिज्राँ कहूँ कैसे कटी थी

कभी शबनम कभी शोले हुए हम


हसीं दामन पे जैसे छींट कोई

चमन में आपके उजड़े हुए हम


ज़ियारत आज पूरी हो गई है

सो क़ाबिल दीद के तेरे हुए हम

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उलझते जायेंगे सुलझे हुए हम

 ख़ुद अपनी घात में बैठे हुए हम ज़बां के तीर हैं छूटे हुए हम जिगर तक आपके पहुँचेंगे कैसे नज़र से आपकी उतरे हुए हम महब्बत में सियासत कर रहे हो...