बुधवार, 29 जुलाई 2015

इक घोंसले के वास्ते, परवाज़ कितनी चाहिये......

फिर बना लूं इक नयी 

कागज की कश्ती आज भी।

है कला वो याद, 

पर बचपन पुराना चाहिये।।


तेरे घर के सामने

 एक घर बनाने के लिये।

सिर्फ पैसा ही नहीं, 

एक प्लॉट खाली चाहिये।।


सीखना है कुछ अगर, 

इन पंछियों से सीखिये।

तिनका-तिनका कर के ही, 

एक घर बनाना चाहिये।।



लब को सी लें, अश्क पी लें, 

और उफ्फ भी ना करें।

है बहुत मुश्किल... मगर, 

दिल बाज़ जाना चाहिये।।


क्या करें क्या ना करें? 

ग़र ऐसी उलझन हो कभी।

क्या करें की सोचकर

सब भूल जाना चाहिये।।


सामने मंजिल अगर, 

खुद से बड़ी लगने लगे।

छोड़ कर हर राह, 

सीधे घर को जाना चाहिये।।

चोंच में तिनका दबाकर, 
ऐ गिरि उड़ते हो क्यों?

इक घोंसले के वास्ते, 

परवाज़ कितनी चाहिये?

                - आकर्षण कुमार गिरि।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर....... " एक घोंसले के वास्ते , परवाज़ कितनी चाहिए " ...... "बात होती बस मकां की फिर तो कोई बात न थी, घर सजाने को मगर हमराज़ होना चाहिए "

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