रविवार, 28 जून 2026

तपाकर हमें पीटती है वो हरदम....

तू दिरहम है, तू ही है दीनार मेरी

तू ही जीत है, तू ही है हार मेरी।


छुपा ले तू मुझको, बस अपने भँवर में

तू साहिल है, तू ही है मझधार मेरी।


तपाकर हमें पीटती है वो हरदम

हुई ज़िंदगी क्यों है लोहार मेरी।


तेरा फैसला आज ना-हक़ हुआ है

गिरी गेंद सीमा के है पार मेरी।


मुसीबत हमेशा ही चलती रहेगी

रहेगी सदा साथ दो चार मेरी।


मुक़द्दर! मुझे मौत की बस सज़ा दे

गवाही में उतरी है सरकार मेरी।


समेटेगी अश्कों को ये उम्र सारी

उदासी है बहुत होशियार मेरी।

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तपाकर हमें पीटती है वो हरदम....

तू दिरहम है, तू ही है दीनार मेरी तू ही जीत है, तू ही है हार मेरी। छुपा ले तू मुझको, बस अपने भँवर में तू साहिल है, तू ही है मझधार मेरी। तपाकर...