बुधवार, 11 अगस्त 2010

मोहब्बत का एक आशियाना तो हो..............

मुझे ऐसे दर से बचाना सनम
जहाँ तुम हो और कोई दुआ भी न हो.

बहुत थक गया हूँ तेरे प्यार में
मोहब्बत का एक आशियाना तो हो.

कोई शख्स ऐसा न ढूंढे मिला
दिल लगाया हो जिसने और हारा न हो.

खुदा ऐसा दिन क्या कभी आयेगा?
बेवफ़ाई का जिस दिन बहाना न हो.

शोखियों में तेरी घोल दी ये गज़ल
भले 'गिरि' न हों पर तराना तो हो.

-आकर्षण  कुमार गिरि


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जानेमन तुमको जानेजां करके हम चले जायेंगे वफ़ा करके। इश्क जादू है, इश्क टोना है रिंद को रख दे पारसा करके। दर्द कोने में छिप के बैठा था रख दिया...