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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

जिंदगी की परिभाषा

चर्चा हो रही थी फिलोसोफी की
बात आगे तक बढ़ गयी
चर्चा होने लगी
जिंदगी के  बारे में
और इसके रहस्यों की
पर चर्चा इससे आगे न बढ़ पाई
कि
आखिर क्या है जिंदगी
घूमना - फिरना
साँसों का चलना
या फिर
दिल का धडकना
या फिर
भावनाओं के उमड़ना
सब अपनी अपनी कह रहे थे
मैं सबका मुंह ताकता रहा
अंत में
सवाल मेरी ओर फेंका गया
आखिर क्या है जिंदगी
मैनें छूटते ही कहा
उससे पूछकर बताऊंगा
जिसने परिभाषित कि है मेरी जिंदगी

ख़ुदा जब सुनेगा गवाही मेरी

है बेबस बहुत बेकरारी मेरी ख़बर में छपी है उदासी मेरी जिसे देखिए देखने आ रहा तमाशा बनी ज़िंदगानी मेरी? सुदामा की चिंता किसी को कहाँ सियासत ...