मंगलवार, 2 नवंबर 2010

महंगाई और चांद-1

इस कमरतोड महंगाई में
जबसे रोटी का जुगाड दूभर हुआ है
कवियों ने चांद में रोटी देखना शुरू कर दिया
और अब.....
धुंधला सा चांद 
अपना पता बताने से डरने लगा है.....

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही रोमांटिक रचना है| अपने भावों को सही तरह से व्यक्त किया है| शुभकामनायें|

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मज़ा इश्क़ में, जान! आया नहीं मिला दर्द दिल को करारा नहीं पलीते में रोगन समाए बिना चिराग़-ए-मोहब्बत तो जलता नहीं ये काजल का टीका और तेरी दुआ...