मंगलवार, 25 नवंबर 2025

तो क्यों आए थे आगे की गली से...

अदावत है मोहब्बत की कमी से।

शराफत मिट गई जग की बही से।


कथा कैसे कहें अपनी किसी से।

मोहब्बत थी हमें एक अजनबी से।


तुम्हें जाना था पीछे की गली से।

तो क्यों आए थे आगे की गली से।


तआर्रुफ कर तो लूं तेरी गली से।

सफर होगा शुरू अगली सदी से।


मुसाफिर हम रहे पिछली सदी से

सफर कटता नहीं आवारगी से।


समाती ही नहीं ये डायरी में।

'मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।'


दुआ अब आखिरी कीजे खुदा से।

लहू रुकता नहीं अब फ़िटकरी से।


तखल्लुस में परेशानी न होती।

ग़ज़ल लिखते अगर संजीदगी से।

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

करो शिकवा मगर संजीदगी से

वो तड़पेगा मोहब्बत की कमी से

जो जलता है निगाहों की नमी से।


यही दस्तूर है सदियों सदी से

समंदर खुद नहीं मिलता नदी से।


मिलन का बोझ सारा है नदी पे 

जो बहती अनवरत अपनी खुशी से।


निभाएं इस कदर रिश्ता सभी से

समंदर ना नहीं कहता नदी से।


तुम्हें करना है क्या ये तुम जानो

शिकायत ना करेंगे हम किसी से।


वज़न काबू में आता ही नहीं है

मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।


मुझे तुम मिल गए हो जिंदगी में

गिला क्यों कर करेंगे मुफलिसी से।


गिरि तुमको कोई न समझेगा

करो शिकवा मगर संजीदगी से।

गिला बेहतर है, दिल की बेकली से....

  मिली बदनामियां मुझको मुझी से जो गुजरे हम तेरी घर की गली से। जमीं पर तब मोहब्बत भी नहीं थी तेरी चाहत हमें है उस घड़ी से। न कह पाओ, निगाहों ...