शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

रख दिया तूने सर-ए-पा करके....

जानेमन तुमको जानेजां करके

हम चले जायेंगे वफ़ा करके।


इश्क जादू है, इश्क टोना है

रिंद को रख दे पारसा करके।


दर्द कोने में छिप के बैठा था

रख दिया तूने सर-ए-पा करके।


खुदा को मुंह दिखा नहीं सकते

किसी बच्चे का दिल दुखा करके।


इश्क में मुंह छुपाना पड़ता है।

'हमने देखा है तज्रबा करके।'


'गिरि' को आप कैसे समझेंगे?

उसके शेरों को फलसफा करके।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

गिला बेहतर है, दिल की बेकली से....

 मिली बदनामियां मुझको मुझी से

जो गुजरे हम तेरी घर की गली से।


जमीं पर तब मोहब्बत भी नहीं थी

तेरी चाहत हमें है उस घड़ी से।


न कह पाओ, निगाहों से बता दो

गिला बेहतर है, दिल की बेकली से।


मैं कांधे पे उठा लेता हूं हल को।

फसल उगती नहीं आवारगी से।


किसानी में कहां बरकत है यारों?

फसल पकती है अश्कों की नमी से।


मोहब्बत में बहुत लिखा है लेकिन

ये घर चलता नहीं है शायरी से।


सुबह से शाम तक फाकाकशी है

'मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।'


खुदा ही जब खताएं कर रहे हैं।

शिकायत क्या करेंगे वो 'गिरि' से।

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

तो क्यों आए थे आगे की गली से...

अदावत है मोहब्बत की कमी से।

शराफत मिट गई जग की बही से।


कथा कैसे कहें अपनी किसी से।

मोहब्बत थी हमें एक अजनबी से।


तुम्हें जाना था पीछे की गली से।

तो क्यों आए थे आगे की गली से।


तआर्रुफ कर तो लूं तेरी गली से।

सफर होगा शुरू अगली सदी से।


मुसाफिर हम रहे पिछली सदी से

सफर कटता नहीं आवारगी से।


समाती ही नहीं ये डायरी में।

'मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।'


दुआ अब आखिरी कीजे खुदा से।

लहू रुकता नहीं अब फ़िटकरी से।


तखल्लुस में परेशानी न होती।

ग़ज़ल लिखते अगर संजीदगी से।

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

करो शिकवा मगर संजीदगी से

वो तड़पेगा मोहब्बत की कमी से

जो जलता है निगाहों की नमी से।


यही दस्तूर है सदियों सदी से

समंदर खुद नहीं मिलता नदी से।


मिलन का बोझ सारा है नदी पे 

जो बहती अनवरत अपनी खुशी से।


निभाएं इस कदर रिश्ता सभी से

समंदर ना नहीं कहता नदी से।


तुम्हें करना है क्या ये तुम जानो

शिकायत ना करेंगे हम किसी से।


वज़न काबू में आता ही नहीं है

मैं आज़िज़ आ गया हूं शायरी से।


मुझे तुम मिल गए हो जिंदगी में

गिला क्यों कर करेंगे मुफलिसी से।


गिरि तुमको कोई न समझेगा

करो शिकवा मगर संजीदगी से।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

मुझे नफरत हुई है खुदकुशी से

मुखातिब हो गया हूं आदमी से।

मोहब्बत हो गई है जिंदगी से।

दुआओं में असर उसके नहीं है।

दुआ देता है वो, पर बेदिली से।


मोहब्बत का नया दस्तूर है ये।

नहीं मिलता यहां कुछ बंदगी से।


गुनाहों को किसी के नाम करता।

मेरा चेहरा नहीं मिलता किसी से।


कोई कितना भी चाहे सर पटक ले।

ये मसला हल नहीं होगा किसी से।


यही हासिल हुआ आवारगी में।

मसाफ़त हो गई उसकी गली से।


बहुत मरता हूं पर मरता नहीं मैं।

मुझे नफरत हुई है खुदकुशी से।


खता कुछ हो गई होगी हमीं से।

ये होती रहती है हर आदमी से।


बहर में कैद कर दिया मुझको।

'मैं आज़िज आ गया हूं शायरी से।'


न बैठो इस कदर संजीदगी से।

'गिरिजी' तब निभेगी जिंदगी से।


रख दिया तूने सर-ए-पा करके....

जानेमन तुमको जानेजां करके हम चले जायेंगे वफ़ा करके। इश्क जादू है, इश्क टोना है रिंद को रख दे पारसा करके। दर्द कोने में छिप के बैठा था रख दिया...