शुभंकर गिरि

Monday, December 5, 2016

उस तीर का स्वागत है जिस पे नाम मेरा है लिक्खा

कभी कातिल, कभी महबूब
कभी मसीहा लिक्खा। 
हमने उनको बेखुदी में 
खुद न जाने क्या  लिक्खा।।


इम्तिहाने जीस्त में हासिल सिफर
पर क्या गिला?
उसको उतने अंक मिले 
जिसने जैसा परचा लिक्खा।।


लाखों दस्तक पर भी तेरा 
दरवाजा तो बंद रहा।
जाते जाते दर पे तेरे
अपना नाम पता  लिक्खा।।


यूं रदीफो काफिया, मिसरे 
हमें मालूम थे।
तुम न समझोगे कि क्यों 
हर शेर को मक्ता लिक्खा??


मेरी मंजिल की दुआ
दिन रात रहती है यही।
पढ़ न पाऊँ मैं उसे
जो मील के पत्थर पे लिक्खा।।



अपनी आदत है नहीं 
मेहमान से मुख मोड़ना।
उस तीर का स्वागत है 
जिस पे नाम मेरा है लिक्खा।।


गीत, गज़लें या रुबाई
तुम जो चाहो सो कहो।
एक मोहब्बत ही लिखा 
और 'गिरि' ने क्या लिखा?

                                            - आकर्षण कुमार गिरि।


10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (07-12-2016) को "दुनियादारी जाम हो गई" (चर्चा अंक-2549) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दिनांक 08/12/2016 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद... https://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
    आप भी इस प्रस्तुति में....
    सादर आमंत्रित हैं...

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  5. xxxxxxxxxxxxबहुत सुन्दर रचना
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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