शुभंकर गिरि

Wednesday, July 29, 2015

इक घोंसले के वास्ते, परवाज़ कितनी चाहिये......

फिर बना लूं इक नयी 

कागज की कश्ती आज भी।

है कला वो याद

पर गुज़रा ज़माना चाहिये।।


तेरे घर के सामने

 एक घर बनाने के लिये।

सिर्फ पैसा ही नहीं

एक प्लॉट खाली चाहिये।।


सीखना है कुछ अगर

इन पंछियों से सीखिये।

तिनका-तिनका कर के ही

एक घर बनाना चाहिये।।



लब को सी लें, अश्क पी लें

और उफ्फ भी ना करें।

है बहुत मुश्किल... मगर

दिल बाज़ जाना चाहिये।।


क्या करें क्या ना करें

ग़र ऐसी उलझन हो कभी।

क्या करें की सोच... 

बाकी भूल जाना चाहिये।।


सामने मंजिल अगर

खुद से बड़ी लगने लगे।

छोड़ कर हर राह

सीधे घर को जाना चाहिये।।

चोंच में तिनका दबाकर, 
'गिरि" उड़ते हो क्यों?

इक घोंसले के वास्ते

परवाज़ कितनी चाहिये?

                - आकर्षण कुमार गिरि।

Thursday, July 16, 2015

जब समझोगे, तब समझोगे.......


बेदर्द सवालों के मतलब

जब समझोगे तब समझोगे।

दुखती रग क्योंकर दुखती है

जब समझोगे तब समझोगे।।





रुखे-सूखे रिश्ते-नाते

और मरासिम मद्धम से।

इनसे होकर कैसे गुजरें

जब समझोगे तब समझोगे।।




एक और एक ग्यारह भी है

एक और एक सिफर भी है।

ये अहले सियासी बातें हैं

जब समझोगे तब समझोगे।।



मंजिल के आने से पहले

मैं क्यों थक कर बैठ गया?

मंजिल भी दूर छिटकती है

जब समझोगे तब समझोगे।।


दिल से दिल को मिलाना होगा

आंख मिलाने से पहले।

ये है बुनियादी बात मगर

जब समझोगे तब समझोगे।।



बदनामी को मोल लिया

हर ताने पर साधी चुप्पी।

मेरी खामोशी का मकसद,

जब समझोगे तब समझोगे।।


हमने तुमको हमदम जाना

तुमने हमको बेच दिया।

'गिरि' के मोल को क्या जानो

जब समझोगे तब समझोगे।।
                                          

                                                    -आकर्षण कुमार 'गिरि'
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